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हमारी थाली में कहां से आई दाल ?

हमारी थाली में कहां से आई दाल ?
यश्वी सिंह


आपसे एक सवाल, खाने में ऐसी कौन सी डिश है जिसे बनाना सबसे आसान है? सोचिये-सोचिये ? नहीं याद आ रहा तो हम बताते हैं। दाल, जी हाँ इसे बनाना सबसे आसान है। पहले के ज़माने में इसे बनाना थोड़ा मुश्किल था लेकिन जब से कुकर जीवन में आया इसे बनाना काफी आसान हो गया। दाल में पानी डाला और उसमे हल्दी व नमक मिलकर ढक्कन बंद करके चढ़ा दिया चूल्हे पर। और जैसे ही कुकर ने दो सीटी बजाई समझ लीजिये दाल पक गई।इसके बाद ये आप पर डिपेंड करता है कि आप इसे बघार कर खाते हैं या सादा। 

 

देशी खाने की बात करें तो दाल-चावल एक ऐसा डिश है जिससे हर भारतीय खुद को जुड़ा महसूस करता है। जब कोई भारतीय विदेश जाता है तो वो वहां सबसे ज़्यादा चावल-दाल मिस करता है।ना जाने इसमें ऐसा क्या है कि इसके खाने से पेट के साथ-साथ मन भी भरता है। भारत में कई तरह की दाल मिलती है और इसे कई तरीके से पकाई भी जाती है। मूंग, चना, तुअर, मसूर, उड़द , मटर, लोबिया और राजमा मुख्य दालों में शुमार हैं और ये कई तरीके से पकाई जाती है। लेकिन इस सब में सबसे ज़्यादा लोग तुअर की फ्राई दाल पसंद करते हैं। इसे तड़के वाली दाल भी कहते है। कई जगहों पर सब्जियां और  मांस-मछली में दाल डालकर भी पकाई जाती है!

 

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दाल के बारे में कहा जाता है कि इसका उल्लेख यजुर्वेद, ऋग्वेद , मार्कंडेय पुराण और विष्णु पुराण में भी मिलता है। फ़ूड  हिस्टोरियन के टी अचाया ने भी अपनी किताब इंडियन फ़ूड: अ  हिस्टोरिकल कम्पेनियन में भी इसका जिक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि भगवान भगवान श्री राम को 'कोसुमल्ली' बहुत पसंद थी। इसमें कच्चा नारियल, खीरा और नीबू का रस भी मिलाया जाता था। के टी अचाया का कहना है कि वैदिक काल में दाल गरीबों की भूख मिटाती थी। 

 

इतना ही नहीं दाल का उल्लेख बौद्ध और जैन साहित्य में भी मिलता है। वहीं दाल जो प्रोटीन का बेहतरीन सोर्स है। 400 ईसा पूर्व के बौद्ध व जैन साहित्य में दाल के बारे में लिखा गया है। इसमें अरहर,  मटर और चने की दाल का उल्लेख है। इसमें ये भी कहा गया है कि ये एलेक्ज़ेंड्रिया से भारत पहुंची। बौद्ध काल में तो दाल को भरकर एक बड़े परांठे जैसी स्वीट डिश बनाई जाती थी। 

 वहीं राजमा के बारे में कहा गया है कि ये हमारी थाली में 350 ईसा पूर्व के बाद आया।

 

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दाल एक ऐसा अनाज है जिसका इस्तेमाल पूरे भारत में किया जाता है। बस इस्तेमाल करने का तरीका अलग है। दक्षिण भारत में भी खाने में दाल का इस्तेमाल भरपूर होता है। चाहे वो इडली हो या डोसा। चाहे वो वड़ा हो या सांभर। इतना ही नहीं 2000 ईसा पूर्व में तो दीवाली और पूर्णिमा के दिन दाल भरे मीठे परांठे, वड़े बनाए जाते थे। दक्षिण के प्रसिद्ध तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश को उड़द दाल के लड्डू चढ़ाए जाते हैं। फ़ूड हिस्टोरियन अचाय के मुताबिक, 30 रसोइये प्रतिदिन 70 हज़ार लड्डू तैयार करते हैं। 

 

 भारत के पुराने साहित्य में भी दाल का उल्लेख है। सन 1130 में मध्य प्रदेश के कल्याण वंश के राजा सोमेश्वर ने अपनी किताब मानसोल्लास में कई तरह की दालों और उससे बनने वाले व्यंजनों का उल्लेख किया है। उनकी किताब के अनुसार विडालपक नाम के व्यंजन को बनाने में पांच तरह के दाल का इस्तेमाल किया जाता था। इसमें राजमा, चना, मूंग, मसूर और तुअर शामिल था। सदियों से दाल हम भारतीयों के खाने का अहम हिस्सा रही है। The Better India के एक आर्टिकल के मुताबिक चन्द्रगुप्त मौर्य की शादी की दावत में  घुघनी बनी थी। ये एक तरह की दाल थी। वहीं अकबर की बेगम जोधा बाई ने मुग़ल खाने में पंचमेल दाल को जगह दिलाई। कहा जाता है कि मुगलों को ये दाल इतनी पसंद आयी थी कि जब तक शाहजहां ने गद्दी संभाली, ये पचमेल दाल शाही का दर्जा पा चुकी थी।  

 

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यदि हम ये कहे की दाल के बिना हमारा खाना अधूरा है तो गलत नहीं होगा। चाहे बिहार का सत्तू हो या फुलौरी, तिलौरी और दही वड़ा हो। ये सब दाल से ही बनाया जाता है। गुजरात में  दाल से ही खांडवी बनती है। वहीँ वेस्ट बंगाल की बात करें तो यहां छोलार डाल यानी चने की दाल बहुत ज़्यादा पसंद किया जाता है। वहीं चने की दाल को शाकाहारी तरीके से पकाना हो या उसमें मछली मिलाकार। फ़िलहाल ये सौ फीसदी सच है कि हमारी थाली दाल के बिना अधूरी लगती  है भले ही उसमे सब्जियों की चाहे कितनी भी कटोरिया क्यों ना हो।  

 

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