चाय की एक कप अपने भीतर ना जाने कितने भाव समेटे होती है। दरअसल चाय कोई पेय नहीं, एक भावना है। मेरा मानना है जब तक दुनिया में चाय नहीं थी, सुबह को “सुबह” कहने का हक़ किसी को नहीं था।
सुबह की पहली चाय एक प्रेम-पत्र है जो खुद से खुद को लिखा जाता है।
कड़क अदरक वाली, इलायची की महक वाली, या हल्की तुलसी वाली – हर कप में एक अलग कहानी होती है।
उसके भाप में उड़ते हुए सपने होते हैं, उसकी चुस्की में पुरानी यादें घुली होती हैं।
एक चाय का कप हाथ में आते ही सारी दुनिया कहती है – “अब शुरू करो।”
भारत में चाय सिर्फ़ पियी नहीं जाती, जी जाती है।
ठेले की कड़क चाय में दोस्ती का स्वाद है,
माँ के हाथ की चाय में ममता है,
बारिश में गर्मागर्म चाय में रोमांस है,
और दादी के हाथ की अदरक-गुड़ वाली चाय में दवा है।
कहीं “दो बिस्कुट लाना” के साथ आती है,
कहीं “एक स्पेशल” कहकर बनवाई जाती है।
हर गली में एक चायवाला है, जो बिना नाम जाने भी आपकी पसंद जानता है।
चाय लोकतंत्र है।
अमीर पीता है चाय, गरीब पीता है चाय।
रेलवे स्टेशन पर 5 रुपये की कुल्हड़ चाय और
पाँच सितारा होटल में 500 रुपये की डार्जिलिंग फर्स्ट फ्लश –
दोनों के बीच सिर्फ़ कीमत का फर्क है, जादू का नहीं।
चाय बहाना है।
“चाय पी लो” कहकर माँ बेटे से बात करती है,
“चाय पिलाओ” कहकर मेहमान को घर का बना देती है,
“चल चाय पीते हैं” कहकर दोस्त सालों का गिला मिटा लेते हैं।
चाय के बहाने रिश्ते गर्म रहते हैं।
विज्ञान भी चाय के आगे घुटने टेक देता है।
एक कप चाय में एंटी-ऑक्सीडेंट, थोड़ी कैफीन, और ढेर सारा सुकून।
सर्दी में गले की खराश मिटाती है,
गर्मी में पसीने के साथ तनाव निकाल देती है।
डॉक्टर कहते हैं – “दिन में दो कप ठीक है”,
पर चाय पीने वाला जानता है – “दिन में दो कप तो सिर्फ़ शुरुआत है”।
चाय समय की सुई है।
सुबह की चाय कहती है – “उठो, दुनिया तुम्हारी है”,
दोपहर की चाय कहती है – “थोड़ा रुककर साँस लो”,
शाम की चाय कहती है – “अब घर चलो”।
अंत में एक सच्चाई:
जिंदगी चाहे जितनी कड़वी हो जाए,
एक कप चाय उसे मीठा बना देती है।
और जब तक दुनिया में चाय है,
तब तक सुबह, दोस्ती, माँ का प्यार, और उम्मीद – सब बाकी है।
तो अगली बार जब कोई कहे “चाय पियोगे?”,
मुस्कुराकर कहना –
“चाय नहीं, जिंदगी पीनी है।”
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